बच्चों को अच्छा भोजन मिल सके जिसके लिए मां बाप ने….| Hindi kahani

Hindi kahani, एक माता पिता जिन्होंने अपने बच्चों के लिए घर, जमीन, kahani hindi me, kahani hindi sangrah,hindi story

Hindi kahani: शायद आपके साथ भी ऐसा हुआ हो, जब आप किसी चीज या खिलौने के लिए अपने माता पिता से जिद्द करने लगे हों या रोने लगे हो। मेरी समझ से ऐसा हर माता पिता और बच्चे की जिंदगी में आना स्वाभाविक है और ऐसा होता भी है। इसका संबंध अमीरी गरीबी से बिल्कुल नही होता।

ऐसे ही इस कहानी के किरदार हैं। इसे आप कहानी मान सकते हैं लेकिन कहीं न कहीं, किसी न किसी या यूं कहें ये कहानी भी ज्यादा लोगों को अपनी कहानी सी लगे। ऐसा मैं इसलिए कह पा रहा हूं कि अक्सर ऐसा हमारे भारतीय समाज में ही होता है।

kahani in hindi (PDF) उत्तर प्रदेश के एक सुदूर छोटे से गांव में एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान दंपति रहते थे, जिनका नाम महादेव और सरस्वती था। उनकी तीन संताने थीं, जिनमे एक पुत्री और दो जुड़वा पुत्र थे। महादेव और सरस्वती का जीवन सामान्य गति से चल रहा था।

लेकिन गांव के ही एक बड़े आदमी के पुत्र की सेना में सरकारी नौकरी लग गई। उस बड़े आदमी ने अपने पुत्र की सरकारी नौकरी लगने की खुशी में रिश्तेदारों और गांव के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया, और पूरे गांव के लोगों को भोजन का निमंत्रण भिजवाया।

गांव के अन्य लोगों की तरह इस भोज का निमंत्रण महादेव के घर भी आया। महादेव के तीनों बच्चे फूले नहीं समाए, महादेव ने बच्चों को आपस में बाते करते सुना जो बिटिया अपने छोटे भाइयों से कह रही थी – “होली के बहुत दिन बाद आज हमे अच्छा भोजन खाने को मिलेगा” ।

इतना सुनकर महादेव की आंखों से गंगा की धार बह चली, जैसे तैसे अपने को संभालते हुए अपनी पत्नी सरस्वती के पास पहुंचकर बिटिया के कहे शब्द सुनाए तो किसान की पत्नी सरस्वती भी भावुक हो गई, लेकिन स्वयं को संभालते हुए अपने पति से बोली; कि भगवान है अपने दिन भी लौट आएंगे।

रात हो चली थी, किसान के तीनों बच्चें घर में जो रूखा सूखा भोजन बना था उसे खाकर सो गए थे। लेकिन महादेव की आंखों से नींद गायब थी और आंखों में पानी भरा था। जिसे देख उसकी पत्नी ने पूछा – “अजी क्यों परेशान होते हो, बच्चों की बातों को दिल पर लेने की जरूरत क्या है”।

लेकिन कहते हैं कि व्यक्ति अपनी तकलीफ को एक बार अनदेखा कर देता है लेकिन बच्चों की तकलीफ असहनीय हो जाती है। ऐसा ही महादेव के साथ हो रहा था। तभी उसकी पत्नी ने महादेव से पूछ लिया कि – आखिर उस बड़े आदमी के बेटे की सेना में सरकारी नौकरी कैसे लगी।

महादेव ने रूंधे हुए गले से बताया कि वो धनवान लोग हैं जिससे वो अपने बच्चे को पढ़ा लिखाकर सेना की नौकरी करने के योग्य बना दिए हैं। इतना सुनकर किसान की पत्नी को मानो खजाना मिल गया हो, वो तपाक से बोली कि – हमारे बच्चे भी पढ़ लिख जाएं तो उनकी भी सेना में नौकरी लग जायेगी।

जिसका उत्तर महादेव ने हां में दिया, लेकिन साथ ही खुद को कोसते हुए कहा कि – हमारी इतनी औकात कहां जो अपने बच्चो को पढ़ा लिखाकर सरकारी नौकरी के योग्य बना सकें। ठीक उसी समय सरस्वती के मानस पटल पर कुछ चल रहा था, जैसे कोई खजाना मिलने वाला हो।

जैसे तैसे रात बीती, अगली सुबह सरस्वती ने अपने पति महादेव से बड़े ही शांत चित्त से कहा कि – हम चाहें तो हमारे तीनों बच्चे पढ़ लिख कर अच्छा भोजन और अच्छा जीवन जीने के अधिकारी हो सकते हैं। काफी विचार विमर्श करने के बाद किसान दंपति अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए राजी हुए।

लेकिन जब नजदीक शहर के एक अच्छे स्कूल में अपने बच्चों का नाम लिखवाने गए तो वहां पर शुल्क काफी ज्यादा थी, ऐसे करते करते कई स्कूलों में गए, लेकिन अत्यधिक शुल्क न दे पाने की स्थिति से हताश होने लगे। ऐसे में मन मानकर बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया।

किसान के तीनों बच्चे भी अपने माता पिता की स्थिति से भली भांति अवगत थे। तीनों बच्चें मन लगाकर पढ़ाई करने लगे। कहते हैं कि ऊपर वाला भी व्यक्ति को हर तरफ से गरीब नहीं करता, कहीं न कहीं संपन्नता देता ही है। (यहां संपन्नता का मतलब बौद्धिकता से है)। तीनो बच्चे अपने माता पिता से कभी अनावश्यक मांग नहीं करते थे।

साल बीतते गए, किसान की बिटिया मैट्रिक पास कर इंटरमीडिएट में चली गईं थी और दोनो जुड़वा बच्चें मैट्रिक में दाखिला ले चुके थे। इधर अब महादेव की खेती से कमाई कम पड़ने लगी थी क्योंकि बच्चे ऊपरी कक्षाओं में पढने लगे थे। लेकिन महादेव अपने जरूरत पड़ने पर रिश्तेदारों से उधार लेकर काम चला लिया करता।

बिटिया ने 12वीं की परीक्षा में जनपद में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो आस पास के लोग बिटिया को आशीष देने आए और साथ ही महादेव को सलाह देने लगे कि – भाई महादेव तुम्हारे हिसाब से बिटिया ने अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली है अब इसके हाथ पीले कर दो, और अपने दोनो बच्चों को पढ़ाओ। लेकिन महादेव और उसकी पत्नी कहां लोगों की बातों में आने वाले थे।

महादेव ने बिटिया का दाखिला स्नातक में करवाया और उसकी बिटिया ने भी पूरे मन से पढ़ाई की और स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर गई। उसी साल दोनों जुड़वा बच्चों ने भी स्नातक में साथ ही दाखिला लिया और पढ़ने लगे।

बिटिया स्नातक की पढ़ाई करने के बाद घर पर खाली बैठी थी। आस पास के लोगो काना फूसी करने लगे कि महादेव अपनी बिटिया के विवाह के लिए कोई तैयारी ही नही कर रहा। लेकिन महादेव के कानों पर जूं कहां रेंगने वाली थी। वो अपनी बिटिया से पूछा कि क्या वो और पढ़ना चाहती है, उत्तर में बिटिया ने कहा कि – पिता जी मैं एक बार पीसीएस की परीक्षा में बैठना चाहती हूं।

इधर दोनो बच्चों का स्नातक पूरा हुआ और बिटिया पीसीएस की पढ़ाई के लिए शहर आ गई। इधर महादेव की आर्थिक स्थिति चरमरा रही थी, उसे अब बहुत ज्यादा आर्थिक दिक्कत होने लगी, यहां तक कि जिन रिश्तेदारों से उधार ले लिया करता था उन्होंने भी अब पैसे देने से मना कर दिया।

बहन को पीसीएस की तैयारी करते देख दोनो भाइयों ने भी अपने माता पिता से पीसीएस की तैयारी करने की बात कही। माता पिता ने तुरंत हां कर दिया और अगले दिन बड़े शहर बहन के पास दोनो बच्चों को पढ़ाई के लिए भेज दिया। लेकिन महादेव ने बच्चों को अपनी स्थिति का आभास तक न होने दिया।

आईएएस – पीसीएस जैसी तैयारियों के लिए पैसा और समय दोनो लगता है। इधर महादेव के पास पैसों की समस्या दिन पर दिन बढ़ने लगी। अपने पति को परेशान देख कर सरवस्ती ने अपने गहने बेचकर बच्चों को फीस और खर्चे भेजे। फिर धीरे धीरे महादेव ने अपनी जमीन बेचकर पैसे भेजने शुरू कर दिए लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं दी।

संयोग ये देखिए तीनो बच्चे एक साथ पीसीएस की परीक्षा में बैठे; इधर महादेव और सरस्वती के पास अब कुछ नहीं रहा मतलब गहना, घर और जमीन सब बिक चुका था। लेकिन ऐसे माता पिता ने अपने बच्चों तक इसकी खबर न होने दी।

महादेव और सरस्वती भी उसी शहर में आ गए थे कि कोई नौकरी करके बच्चों के पास पैसे भेजेंगे। जहां बच्चे पढ़ रहे थे। जैसे तैसे महादेव को सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिली। महादेव सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर पैसे बच्चों को भेजने लगा, लेकिन उसी शहर में रहकर अपने बच्चों से दूर रहा।

कहते हैं कि” ऊपर वाला जब देता है छप्पर फाड़कर देता है।” ऐसा ही हुआ महादेव और सरस्वती के साथ। जिस दिन पीसीएस का अंतिम परिणाम आने वाला था। उसी दिन महादेव की ड्यूटी भी उसी कोचिंग इस्टीट्यूट के मेन गेट पर लगी, जहां उसके बच्चे पढ़ते थे। इस दौरान महादेव ने अपने चेहरे को अंगोछे से ढक रखा था कि कहीं उसके बच्चे उसे पहचान न लें।

चेहरा अंगोछे से ढके होने के बावजूद महादेव को उसकी बिटिया ने कोचिंग इंस्टीट्यूट में जाते समय पहचान लिया था, पिता की ऐसी हालत देख बिटिया की आंखे डबडबा गईं, लेकिन खुद को संभालते हुए अपने भाइयों के साथ कोचिंग इंस्टीट्यूट में परिणाम देखने चली गई।

परीक्षा के परिणाम की घोषणा हुई जिसमे महादेव की बिटिया उत्तर प्रदेश में प्रथम स्थान और दोनो बेटे क्रमशः सातवें और ग्यारहवें स्थान पर आए। इसके बाद महादेव की बिटिया अपने दोनो भाइयों को लेकर दौड़ती पड़ती हुई मेन गेट तक पहुंचती है और अपने हाथों से अपने पिता के चेहरे से अंगोछा हटा देती है।

अपने सामने अपने पिता को ऐसे देख कर तीनों बच्चों पिता से लिपटकर फूट फूट कर रोने लगते हैं। किराए के घर पहुंचकर मां से मिलते है और फिर वही गंगा जमुना की धारा फिर से फूट निकलती है। अगले दिन अखबार में तीनों बच्चों के छपे फोटो को अपनी पत्नी सरस्वती को दिखाकर रुवांसे गले से महादेव कहता है कि – “अब उसके बच्चों को हर रोज अच्छा भोजन मिलेगा” ।।

ये कहानी कैसी लगी। कमेंट करके जरूर बताएं। अब आपको इस ब्लॉग पर ऐसी ही अच्छी कहानियां हिंदी में पढ़ने को मिला करेंगी। साथ ही आपके बहुमूल्य सुझावों की भी दरकार रहेगी। अपने स्नेह बनाए रखें।

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